हम हरसू ही यादों की कबर में रहते हैं
चंद चेहरे हरपल मेरी नज़र में रहते हैं
कैसे होगा बाल बांका कभी मेरा क्यूंकि हम
किसी की दुआओं के असर में रहते हैं
किसी की दुआओं के असर में रहते हैं
डुबो तो दूँ सारी बस्ती को आंसुओं से
मगर कुछ अपने भी शहर में रहते हैं
मगर कुछ अपने भी शहर में रहते हैं
काट के बनाओगे आशियाँ पर सोंच लो
कुछ परिंदे बर्षों से इस शज़र में रहते हैं
कुछ परिंदे बर्षों से इस शज़र में रहते हैं
ना बन कभी पत्थर का साहिल सुन ले
सागर में कांच से अरमाँ लहर में रहते हैं
सागर में कांच से अरमाँ लहर में रहते हैं
खरीद लेते हैं जो सब कुछ ही जहां में
वही लोग सदा हरपल खबर में रहते हैं
वही लोग सदा हरपल खबर में रहते हैं
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