Monday, 9 March 2015

हम हरसू ही यादों की कबर में रहते हैं

चंद चेहरे हरपल मेरी नज़र में रहते हैं

कैसे होगा बाल बांका कभी मेरा क्यूंकि हम

किसी की दुआओं के असर में रहते हैं

डुबो तो दूँ सारी बस्ती को आंसुओं से

मगर कुछ अपने भी शहर में रहते हैं

काट के बनाओगे आशियाँ पर सोंच लो

कुछ परिंदे बर्षों से इस शज़र में रहते हैं
ना बन कभी पत्थर का साहिल सुन ले

सागर में कांच से अरमाँ लहर में रहते हैं

खरीद लेते हैं जो सब कुछ ही जहां में

वही लोग सदा हरपल खबर में रहते हैं

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